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भाजपा की ट्रिपल सेंचुरी के बाद, तथाकथित चुनावी विशेषज्ञों को संन्यास ले लेना चाहिए

भाजपा की लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत पर, देश के तथाकथित ‘बुद्धिनाथों’ को सन्यास ले लेना चाहिये.लोकसभा चुनाव से पूर्व ही हमारे देश का तथाकथित वर्ग अपना प्रोपोगंडा चलाने लगा था, पर चुनाव के नज़दीक आते ही ये सब चुनाव विशेषज्ञ बनकर भाजपा विरोधी ट्रेंड दिखाने की होड़ में लग गये थे. हालांकि, भाजपा को मिले जनादेश ने इन सबपर करारा तमाचा की तरह वार किया है.

इनके छद्म ज्ञान से उपजा विश्लेषण था कि देश में अब मोदी लहर नहीं रही, भाजपा की सरकार अब नहीं बन सकेगी. इनके इस विश्लेषण पर जनता ने करारा प्रहार किया. मोदी लहर नहीं कहर बनकर इनपर बरसी. मोदी सरकार अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ 282 से 300 पार गयी.

खुद को निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकार मान चुके पुण्य प्रसून वाजपेयी भी अपना विश्लेषण लेकर आये. जिसमे उन्होंने बीजेपी को 150 सीटों में सीमित करके रख दिया,और साथ ही कांग्रेस को 100 पार सीट दिला डाला.नतीजा आपके सामने है.बिना काम धंधे के घर में बैठ कर हवाबाज़ी बनाने से ऐसे ही हवा निकल जाती है.इन्ही की तरह एक और पत्रकार हैं विनोद दुआ जिन्होंने तो खुद को भगवान् ही मान ही लिया है. वो NewsClick की ग्राउंड रिपोर्ट, वायर के सोर्स और अपनी कम अक्ल से इस लोकसभा का आकलन करते हैं।जहाँ सम्पूर्ण NDA को ही 200 सीटों में समेट दिया था और UPA की सरकार बनवा दी थी.इन दोनों को इनके चैनल ने तो नकारा ही रखा है,अब इनके आकलन और आकड़ों की धज्जियाँ जनता उड़ा रही है.


विशेषज्ञयों की लिस्ट में योगेंद्र यादव भी थे,जिनकी पार्टी को दिल्ली की जनता ने लोटा भर भी वोट नहीं दिया, वो सबसे नोटा दबाने की अपील कर रहे थे. साथ ही बीजेपी को 200 से कम सीट की भविष्यवाणी कर रहे थे.बाकी नतीजा सबके सामने है.

मोदी विरोध में लंबे-चौड़े लेख छापे गये.जिसमें मोदी सरकार की वापसी इस बार क्यों दोबारा चुनकर नहीं आएगी. इन सबने लिखा कि भाजपा देश को आर्थिक सुविधा दिलाने में नाकाम रही, और सिर्फ धर्म आधारित राष्ट्रवादी एजेंडा चलाने में व्यस्त रही, जिसे लोगों ने नकार दिया है. जिसके चलते भाजपा का सत्ता में वापसी कर पाना नामुमकिन है, बल्कि इस देश किसी अन्य अपना प्रधानमंत्री बनाने की सोच से वोट देगा.

इसी तरह के विशेषज्ञों में राजनीतिक पत्रकार तुफैल अहमद ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया था. जिसमें इनके अनुसार राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश में सूपड़ा साफ की ही भविष्यवाणी कर डाली थी. पर जब परिणाम आये तो इनकी भविष्यवाणी, झूठीवाणी साबित हुई.

https://twitter.com/freentglty/status/1132096949232922629/photo/1?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1132096949232922629&ref_url=https%3A%2F%2Fhindi.rightlog.in%2F2019%2F05%2Fleft-liberal-politics-02%2F

23 मई को जब परिणाम आया तो इन सब के विश्लेषण पर पानी फिर गया.जनता ने इनके विश्लेषण को खारिज करते हुए ,इनके मुँह पे कालिख पोतने का काम किया.

इन बुद्धिनाथों की बिरादरी ने मोदी विरोध में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, पर नतीजों ने सिद्ध किया ये इनका विश्लेषण नहीं बल्कि इनके मानसिक दिवालियापन की उपज मात्र थी.देश की नब्ज पकड़ने के लिये बुध्दिजीवी हिना जरूर नहीं, बस AC कमरों से निकलकर जनता के मूड का विश्लेषण करने की ज़रूरत है, जिसमे ये फिसड्डी साबित हो चुके हैं. उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है, पर उसे जनता का मूड बताकर बरगलाने का नहीं.

इन खोखले दावों से साबित होता है कि इन्हें खुद को विशेषज्ञ, पत्रकार कहलाना बंद करवा देना चाहिये और साथ ही अपनी मानसिक कचड़े को निकालने हेतु कुछ दिनों के लिये वनवास में चले जाना चाहिये.

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अब क्या करेगा बेचारा सिद्धू ?

द ‘कायर’ (द वायर) के सभी चुनावी विश्लेषण गलत, पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ प्रपंच कर रहे हैं ये लोग