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असली ‘वीर’ कौन सावरकर या नेहरू ? पढ़ें और जानें

साल 1950 में भारत सरकार ने एक कानून पारित किया जिसका नाम था प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग रोकथाम) कानून। इस कानून के तहत संरक्षित नामों के दुरुपयोग पर रोक है। हालांकि इस कानून में सिर्फ तीन ही व्यक्तियों के नाम है पहले छत्रपति शिवाजी दूसरे गांधी जी और तीसरे पं. नेहरू। मतलब साल 1950 में अपनी ही सरकार में प.नेहरू अपने ही नाम को संरक्षण दे रहे थे वो भी राजनीति में सक्रिय रहते हुए। उस पर तुर्रा ये कि बोलने की आजादी और लोकतंत्र के कितने बड़े समर्थक थे।

पं. नेहरू का नाम किसी विवाद में नहीं घसीटा जा सकता। कानून इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन वीर सावरकर के लिए जो गाली मन में आए दी जा सकती है। बताया जाता है कि सावरकर ने अपनी सजा खत्म करने के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी थी सवाल ये है कि कथित माफीनामा लिखकर साल 1921-22 काला पानी से वापस लौटे ‘अंग्रजों के दलाल’ सावरकर का अंग्रेजों ने क्या किया। काला पानी के बाद करीब तीन साल उन्हें रत्नागिरी जेल में रखा गया और इसके बाद करीब 12 साल 1937 तक उन्हें रत्नागिरी में नजरबंद रखा गया। जिस दौर में वो कांग्रेसी नेता जिनसे अंग्रेज थर-थर कांपते थे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने लंदन जाया करते थे सावरकर को रत्नागिरी से एक कदम बाहर निकालने की इजाजत नहीं थी। अपने जीवन के 27 साल सावरकर जेल या नजरबंदी में रहे और उन्हें कुल सजा दो जन्म कारावास यानि 60 वर्ष की थी। देश आजाद होने के बाद कोई उपनाम, पद, सम्मान तो दूर अंग्रेजों द्वारा जब्त किया पैतृक आवास तक उन्हें वापस नहीं दिया गया।

फिल्म चित्र

सावरकर के पहले बेटे प्रभाकर की बचपन में ही बिमारी से मौत हो गई थी। बड़े भाई को बेटे की मौत के 15 दिन बाद गिरफ्तार करके काला पानी भेज दिया गया और उनका घर भी इसी दौरान अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। बारिश की एक पूरी रात उनकी पत्नी को मंदिर में गुजारनी पड़ी थी क्योंकि कोई उन्हें अपने घर में शरण तक देने को तैयार नहीं था। ऐसे समय में भी जब 60 साल की सजा पाए अपने पति से काला पानी जाने से पहले नासिक जेल में मिलने उनके पत्नी पहुंची तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा “अगर सर्वशक्तिमान दया दिखाता है, तो हम फिर से मिलेंगे। तब तक, यदि आप एक साधारण परिवार के जीवन के विचार कभी भी अपनी मन में लाती हैं, तो याद रखें कि अगर घर बनाने के लिए बच्चों को पैदा करने और कुछ टहनियाँ इकट्ठा करना ही विवाहित जीवन कहा जाता है, तो इस तरह के जीवन में कौवा और गौरैयों भी जीते हैं। लेकिन अगर विवाहित जीवन को कोई महान अर्थ दिया जाना है, तो हम मनुष्यों के लायक जीवन जीने के लिए धन्य हैं। हमारे चूल्हा और बर्तन को तोड़कर, भविष्य में हजारों घरों से सुनहरा धुआं लग सकता है और जब हम उनको बना रहे थे, तो क्या हमारे घरों को उजाड़ने में कोई परेशानी होनी चाहिए? बाधाओं का सामना बहादुरी से करें। “

जो लोग सवारकर को गाली देते हैं और नेहरू को महान स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि पेचिस में मुट्ठी भर चने खाकर कोल्हू में जुतने वाले सावरकर क्या गद्दार हैं और जिनके लिए नैनी जेल में घर से टिफिन में खाना आता है ऐस नेहरू देशभक्त!

जिनका बेटा प्रभारक पिता से दूर इलाज के अभाव में चल बसा वो सावरकर क्या गद्दार हैं और जो जेल से अपने बेटी को जीवन दर्शन की चिट्ठियां लिखते थे ऐसे नेहरू देशभक्त!

वो जिनका जब्त किया मकान तक वापस नहीं लौटाया गया ऐसे सावरकर गद्दार हैं और वो जिनके नाम आनंद भवन नाम का महल रहा ऐसे नेहरू देशभक्त!

वो जिनका नाम इतिहास से मिटाया गया, जिनके पूर्वजों ने जिन्ना को वोट दिया ऐसे कुपूत्रों द्वारा अपमानित सावरकर गद्दार या अपनी सरकार में अपने अपने नाम पर कानून लागू कर दे वो नेहरू देशभक्त!

सत्ता चाहे कितना दबाए, दशकों प्रोपेगेंडा चलता रहे लेकिन समाज अपना नायक ढूंढ ही लेता है। लाख रुपए की मनसबदारी वाला मानसिंह किसे याद है समाज को याद है तो घास की रोटी खाने वाला प्रताप।

तो आखिर आज वो कौन है जिसके आगे आज देश के प्रधानमंत्री हाथ जोड़े बैठें हैं….

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