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द ‘कायर’ (द वायर) के सभी चुनावी विश्लेषण गलत, पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ प्रपंच कर रहे हैं ये लोग

चुनाव बीत गये हैं,विश्लेषण खत्म हो गये, परिणाम भी आ गये है और इतिहास भी रच गया है. टीवी पर VIP सीटों पर चर्चा ज़ोरों पर है, योजना के लाभ पर मिले वोट भी बहस का हिस्सा बन रहे हैं.फिर उसके बाद ही कुछ इस्तीफे के ड्रामे की खबरें ज़ोर पकड़ने लगी, जिसमे इस्तीफे देना वाला तैयार है पर लेने वाला कोई नहीं, मतलब फुल मनोरंजन चल रहा है.

वैसे ये सब तो चलते रहेगा, पर इन सबके बीच चुनाव के दौरान ‘प्रपंच’ मीडिया गिरोह की विशेष चुनावी रिपोर्टिंग पर गया. मन में उत्सुकता थी कि परिणाम और उनके विश्लेषण ने क्या सिद्ध किया। ये गिरोह बहुत बड़ा है इसलिए उनमे से एक को चुना है, उससे आप सबपे निगाहें दौड़ा लेना। सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे नज़र आएंगे.

हाँ तो शुरू करते हैं.जिसे चुना है वो ‘कायर’ है. माफ़ी ‘द वायर’ है.जिसके मालिक हैं सिद्धार्थ वर्धराजन हैं. पेशे से पहले पत्रकार थे, पर अब ‘प्रपंचकर्ता’ हैं.

जिस तरह के भड़काऊ हेडलाइन और लेख ‘प्रपंच’ पोर्टल ‘द वायर’ पर इस चुनावी माहौल में लिखे गए हैं,और जिस हिसाब से शत-प्रतिशत गलत साबित हुए हैं,उन्हें नैतिकता के आधार पर पोर्टल बंद कर देना चाहिए,और सार्वजानिक रूप से जनता से माफ़ी मांगनी चाहिए। क्यूंकि वो बेशक सभी रिपोर्टिंग की खबर रखते होंगे, और जानते होंगे की वो गलत हैं.

अपने फण्ड की पूर्ति और विचारधारा की संतुष्टि के लिए चुनावों को प्रभावित करने के लिए एक से एक प्रपंच लगातार मोदी सरकार के खिलाफ करते रहे.अपने आकाओं को खुश करते रहे. पर जब ज्ञान न हो,गलत मंशा हो, पत्रकारिता की जगह प्रपंच रचना हो, तो उस कायर की कायरतापूर्ण हार तो होनी ही थी.

प्रपंचकर्ता (पत्रकारिता)के तथाकथित लोगों ने वैचारिक स्तर पर खूब ‘फ़र्ज़ी’ पत्रकारिता की.सबने मिलकर यह माहौल बनाने की कोशिश की कि भाजपा हर जगह हार रही है.बताया गया कि बंगाल में भाजपा अपनी औकात से ज़्यादा का लक्ष्य रखा है.उत्तर प्रदेश से चालीस सीटें जाना तय है.भाजपा हिन्दी भाषी प्रदेशों में 75 सीट हार रही है.झारखंड में भी भाजपा सीटें हार जाएगी.फिर दूसरे लेख में लिखा गया कि सत्ता विरोधी लहर चल रही है,सांसद भी विद्रोह की भावना में लिप्त हैं.पर परिणाम आपके सामने हैं.

इनमें तर्क खोजने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ये पत्रकारिता नहीं प्रपंच करते हैं.जहाँ उद्देश्य पहले, खबर बाद में लिखी जाती है.तर्क मिलेगा नहीं, पर इनकी सोच की पड़ताल करते हैं.बात बंगाल की करते हैं.‘द वायर’ के कायर पत्रकार बिन बंगाल गये ही यह सोच लिया होगा कि वहाँ तो पंचायत चुनावों में भाजपा को करारी हार मिली थी. पर वो यह भूल जाएगा कि वहाँ चुनाव बैलेट से हुए थे, और सम्पूर्ण चुनाव धाँधली और हिंसा के बल पर हुआ जिसके बूते एक तिहाई सीटों पर तृणमूल निर्विरोध चुनाव जीत गयी.

अमित शाह के बंगाल दौरे के दौर विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने के विवाद में ‘द कायर’ ने अपने निजी उच्च वर्धराजन न्यायालय का प्रयोग करते हुए फैला सुना दिया कि भाजपा वालों ने ही मूर्ति तोड़ी और उनको इसका अंजाम चुनावों में भुगतना पड़ेगा.अब आज का वोटर ऐसी घटनाओं पर हमेशा अलग सोच के साथ सोचता है. लम्पट केजरीवाल ने खुद ही थप्पड़ मरवाए होंगे,आतिशी ने ही पैंफलेट छपवाए होंगे, तृणमूल के गुंडों ने ही मूर्ति तोड़ी होगी ताकि लोगों की भावनाएं उनकी तरफ हो जाए। लेकिन ऐसा होता कुछ भी नहीं, बल्कि लोग अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाते.

आखिर ये कायर पत्रकार फिर ऐसे क्यों लिख रहे होंगे? इसके पीछे का कारण क्या है?इसका असल कारण यह है कि ये ग्राउंड रियालिटी ‘रिपोर्ट’ करने के नाम पे कहीं ज्यादा ‘क्रिएट’ करने की कोशिश करते हैं. नैरेटिव सेट करना है वो तो कहीं से भी हो जाएगा।इस तरह के लेख सिर्फ बंगाल के लोगों को भाजपा से डराने की कोशिश है, और तृणमूल को जिताने की.

तर्क और सच से इनका कोई सम्बन्ध है नहीं इसलिए वायर के पिक्सल को काला करते हुए लिखा कि कन्हैया बेगूसराय में आगे है।वायर के पत्रकारों ने ये सब करने की ज़रूरत नहीं समझी। कारण लिखा गया कि बेगूसराय को सिर्फ जाति और मज़हब के चश्मे से नहीं देखना चाहिए, वहाँ विचारधारा भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रपंचकर्ता ने तो बाक़ायदा ‘ग्राउंड रियालिटी’ नामक मुहावरे का प्रयोग भी कर डाला था.

जबकि, इनकी ग्राउंड रियलिटी जमीनी हक़ीक़त से जितना दूर थी, उतनी ही दूरी से कन्हैया गिरिराज से चुनाव हारा. बेगूसराय में जाति और मज़हब से कहीं ज़्यादा पार्टी की बात चलती है, लेकिन सिर्फ भाजपा के मामले में. ये मैंने दो महीने पहले लिखा था कि बेगूसराय का भूमिहार मुसलमान को सांसद बनाता है बस शर्त है कि वो प्रत्याशी भाजपा से हो .एक वक़्त के बाद बेगूसराय में वामपंथ को नकारा जाता रहा है और कई चुनावों से तो वो विधानसभा भी नहीं पहुँच सके हैं. लेकिन वायर के कायरों का क्या है, वो तो वही लिखेगा जो उसके प्रोपोगंडा को सही रहेगा है. इनके लिए ग्राउंड रिपोर्ट सिर्फ ग्राउंड रियलिटी लिख देने से ही पूरी हो जाती है.

यही हाल उत्तर प्रदेश की चालीस सीटें जाएँगी वाली रिपोर्ट का हुआ.क्यों ? क्योंकि इसका सीधा गणित है सपा और बसपा का ब्ला-ब्ला-ब्ला वाला फ़ैक्टर को कौन काउंटर करेगा ?पर वो भूल गए कि जिस मायावती ने अपनी पहचान ही गेस्ट हाउस कांड को लेकर बनाई, और खुद को दलितों का मसीहा बताया, वही दलित कार्यकर्ता उसके निजी राजनीतिक लाभ के चलते अपने आत्मसम्मान से समझौता कर लेगा.

चुनाव जैसे-जैसे बढ़ते गए, इनका प्रपंच फैलता गया। बीच-बीच में नितिन गडकरी के प्रधानमंत्री बनने की राह दिखने लगते थे.जबकि नितिन गडकरी हर बार मना करते रहे.ये सिर्फ भाजपा को भीतर से भड़काने की कोशिश थी। इसके बाद ‘द वायर’ ने अपना ज्ञान दिया कि कैसे विपक्ष कर्नाटक की तरह राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देगा।

फिर मानसिक दिवालियापन के चलते बताया गया कि मोदी हर वो चीज है जो आपके माँ-बाप ने कहा होगा कि वैसा मत बनो। ये वाहियात किस्म की बातें उसी स्तर का लीचड़पना है जिस स्तर से आपको राहुल गाँधी में भारत का प्रधानमंत्री दिखता है और वो पूजनीय हो जाता है। ये वैचारिक स्तर नहीं है, बल्कि ये कुंठा है। ये घृणा है जिसे ‘कायर’ का पत्रकार अपनी खुन्नस में लिख रहा है. मेरी निजी सलाह है कि ये पत्रकार अपने ,माई -बाप बदल ले, इनकी ज़िन्दगी में अच्छे दिन ज़रूर आ जायेंगे।

इनका हर गलत तर्क, हर गलत भाव,गलत भावना और मंशा, इनके लेख में देख पाएंगे। ये है इनके वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रकाश के तार। लेकिन ये रुकने वाले नहीं। ये इसी तरह के ‘प्रपंच’ वाले विश्लेषण करते रहेंगे जिससे भोली-भाली जनता को भड़काया जा सके. इनके पास में सब कुछ है। ये हर क्षेत्र में जा सकते हैं, ग्राउंड रिपोर्ट कर सकते हैं, बड़े सैम्पल साइज के साथ सर्वेक्षण कर सकते हैं, लेकिन कभी करते नहीं।

वो इसलिए कि प्रपंच लिखने के लिए बाहर जाना ज़रूरी नहीं होता। अच्छा और सच्चा पत्रकार पहले आँकड़े, तथ्य, विचार और सूचनाएँ इकट्ठा करता है, तब शीर्षक बनाता है, ‘द वायर’ के पत्तलकार कूड़ेदान पर बैठकर आइडिया सोचते हैं, और उसके हिसाब से तथ्य बनाते हैं, तर्क गढ़ते हैं, सूचनाएँ रचते हैं और विचार प्रेषित करते हैं.

सिद्धार्थ वरदराजन की नौटंकी चलती रहेगी क्योंकि पत्रकारिता के नाम पर यही हो ही रहा है। इनका गैंग एक वेल ऑयल्ड मशीन की तरह, बिना किसी अवरोध के लगातार प्रोपेगेंडा छापता रहेगा। इनको पता है कि सूचनाओं का एक नाम के साथ बाहर जाना ज़रूरी है, न कि उनका सत्य होना। सत्य और असत्य तो दृष्टिकोण भर हैं जो वायर के पत्रकार ऑन डिमांड मैनुफ़ैक्चर करते हैं। और यही लोग कहते हैं कि भारत मैंनुफैक्चरिंग सेक्टर में कुछ नहीं कर रहा!

ये कायर पत्रकारों की नौटंकी चलती रहेगी क्योंकि पत्रकारिता के नाम पर यही चल रहा है। इनका गिरोह एक वेल ऑयल्ड मशीन की तरह, बिना किसी रुकावट के लगातार प्रोपेगेंडाचलाता रहेगा। इनका काम है हर चीज़ को नकरात्मक दिखाकर एक नाम क साथ जोड़ दो. सत्य और असत्य तो बस बात भर हैं जो कायर के पत्रकार ऑन डिमांड प्रेषित करते हैं। और यही लोग कहते हैं कि भारत में मैंनुफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट दर्ज़ की जा रही है.

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