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नेहरू की पांच ऐतिहासिक गलतियां, जिसकी सजा भारत आज भी भुगत रहा है

भारत एक ऐसा देश है जिसने गुलामी का दंश सैकड़ों वर्ष झेला.पहले मुगलों की, फिर बाद में अंग्रेज़ों की, गुलामी के वक़्त किसी भी शख्स को यह अधिकार नहीं था कि वो खुद कोई फैसले कर सके. भारत को इस गुलामी से आजादी दिलाने के लिए सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अपनी जान भारत माँ के नाम कर दी. देश की आज़ादी में शहीद हुए क्रांतिकारिओं की शाहदत पर देश के राजनेता अपने राजनीतिक दलों का निर्माण कर रहे थे. इनमे से एक राजनेता ऐसे भी था जिसने भारत की आज़ादी में जितना योगदान नहीं दिया, उससे कहीं ज़्यादा आज़ाद भारत को नुकसान पहुंचाया. इस राजनेता का नाम है पंडित जवाहर लाल नेहरू.


नेहरु को आधुनिक भारत के शिल्पकार होने की कहानियां आपने बहुत सुनी होंगी, कांग्रेस को उनकी उपलब्धिओं का महिमामंडन करते देखा होगा लेकिन उनकी गलतियां के विषय में आज तक आप के पास कोई जानकारी नहीं पहुंची होगी।

आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे जवाहर लाल नेहरू,जो इस पद पर सबसे ज़्यादा समय तक रहने वाले नेता भी हैं. आज हम आपको उनके उन 5 फैसलों के बारे में बताएंगे, जो उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी गलतियां रही हैं. जिसकी सज़ा भारत आज भी भुगत रहा है.

1-कोको आईलैंड: नेहरू की सबसे बड़ी गलती में से एक है कोको आइसलैंड। इस आइसलैंड की सहायता से भारत चीन पर नजर रख पाता था। ये कोको आइलैंड असल में नेहरु ने कोको आइलैंड जो १९५० तक भारत के पास था उसे बर्मा देश को उपहार के तौर में दे दिया था, जिसे बर्मा ने बाद में चीन को दे दिया।

2-संयुक्त राष्ट्र की परमानेंट सीट: आज देश जिस UN सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए प्रयत्न कर रहा है, कभी ये सीट भारत को उपहार के रूप में दी जा रही थी. लेकिन तब के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे ठुकरा कर चीन को देने का प्रस्ताव दे दिया था.हालाँकि अमेरिका भारत को 1953 में ही संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्य बनाना चाहता था.

3-1962 की हार और कैलाश मानसरोवर पर नेहरू- 1962 के चीन के साथ युद्ध में पराजय पर चीन ने करीब 14000 वर्ग किलोमीटर भारत का हिस्से का कब्ज़ा लिया। इस युद्ध पर भारत सरकार द्वारा गठित समिति जिसमें लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और मिलिट्री कमांडर ब्रिगडियर पी. एस. भगत थे उन्होंने इस हार का ज़िम्मेदार नेहरू की कायर नीतिओं को ठहराया था. इस युद्ध में पराजय स्वरूप हमारे देश का लगभग 14000 वर्ग किलोमीटर भाग चीन के पास चला गया था.जिसमें कैलाश पर्वत और मानसरोवर भी आते थे. जब इस विषय में नेहरू पर सवाल उठने लगे तब उन्‍होंने जवाब देते हुए कहा था कि ‘कैलाश मानसरोवर देश के लिए कोई महत्‍व नहीं रखता है क्‍योंकि वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता’ !

4- कश्मीर समस्या और धारा 370- जब कश्मीर में कबाइली सेना घुस आई थी और महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी थी.तब सरदार पटेल ने मदद के बदले जम्मू-कश्मीर का विलय भारत से करने की शर्त रखी थी. जिसके तहत ही भारतीय सेना मदद करने पहुंची थी. बाद में इस मसले को नेहरू संयुक्त राष्ट्र ले गए और कश्मीर में 70 साल से दोनों देशों के बीच में विवाद बना हुआ है. नेहरू की नीति का परिणाम ये हुआ कि कश्मीर का एक तिहाई भाग पाकिस्तान के बाद चला गया.
नेहरू यहाँ भी नहीं रुके, अपनी जिद और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के चलते आंबेडकर जैसे नेताओं के विरोध के बावजूद धारा 370 की आग कश्मीर में लगा दी.

5-बलूचिस्तान आज भारत का हिस्सा होता- बलूचिस्तान के नवाब ‘कलात खान ‘ ने 1948 में बलूचिस्तान का भारत में विलय करने का प्रस्ताव नेहरू के समक्ष रखा था और साथ ही विलय प्रस्ताव का पत्र भी नेहरू को भेजा था पर उन्होंने इसे अस्वीकार्य कर दिया था.अगर तब नेहरू ये गलती न करते तो आज बलूचिस्तान हमारा हिस्सा होता है जो पाकिस्तान को दबा कर रखने में बहुत मददगार साबित होता।

देश का एक सत्ताधारी वर्ग हमेशा से पंडित नेहरू का महिमामंडन करता आया है, पर कभी भी उनके द्वारा भारत को कमजोर बनाने की नीतिओं की चर्चा नहीं की जाती है.आप ही तय करें कि आखिर नेहरू की इन गलतिओं पर क्या होना चाहिए ?

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